शादी की वह भागदौड़ और पंडाल का शोर अब धीरे-धीरे थम चुका था। बारात विदा हो चुकी थी और घर के थके-हारे रिश्तेदार अगली सुबह की ट्रेन पकड़ने के लिए रेलवे स्टेशन की तरफ रवाना हो गए थे। आरुषि, जो महज अठारह साल की थी और उस शादी में अपनी बड़ी बहन के साथ हर वक्त साए की तरह घूम रही थी, उसका बदन इस वक्त थकान से चूर था। उसने अभी भी वही भारी-भरकम डिजाइनर लहंगा और क कसे हुए गहने पहन रखे थे, जो उसकी कमसिन और उभरती हुई जवानी पर कयामत ढा रहे थे। ट्रेन के उस एसी कूपे (AC Coupe) का दरवाजा अंदर से बंद होते ही, जैसे ही ट्रेन ने प्लेटफॉर्म छोड़कर पटरियों पर रफ्तार पकड़ी, कूपे के भीतर का माहौल अचानक बदल गया। आरुषि अपनी सीट पर सुस्त बैठी ही थी कि उसके ससुर, बृजमोहन सिंह, जो अब तक बारात की आवभगत में व्यस्त थे, उनकी आँखों में एक अजीब सी पैनी और भूखी चमक तैरने लगी।
"थक गई होगी न, बिटिया?" बृजमोहन सिंह ने अपनी भारी और मखमली आवाज में कहा, और अपनी सीट से उठकर सीधे आरुषि के ठीक बगल वाली सीट पर आकर बैठ गए।









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