सूरज अभी ठीक से निकला नहीं था, लेकिन दिल्ली के उस पुराने और संकरे मोहल्ले में चहल-पहल अपने चरम पर थी। आज मोहल्ले के प्राचीन मंदिर में एक विशाल भंडारे का आयोजन था। गली के हर नुक्कड़ पर हलवा-पूरी की सोंधी महक फैल रही थी और बड़े-बड़े कड़ाही के पास सेवादार पसीना बहा रहे थे।
इसी भीड़भाड़ के बीच, एक घर के चौबारे पर खड़ी नव्या अपनी प्लेट ठीक कर रही थी। नव्या उस घर की छोटी बहू थी। उसकी उम्र अभी मुमुक्षु कच्ची और मचलती हुई थी—महज इक्कीस साल। उसने आज इस खास मौके पर एक बेहद खूबसूरत, चमकीला और बदन से बिल्कुल चिपका हुआ नया चूड़ीदार पहन रखा था। पिस्ता हरे रंग के उस बारीक कढ़ाई वाले चूड़ीदार में उसकी सजी-संवरी और उभरती हुई जवानी ऐसी लग रही थी, जैसे किसी ने आग पर पेट्रोल छिड़क दिया हो। उसके चूड़ीदार की फिटिंग इतनी कसी हुई थी कि उसके शरीर का हर एक तीखा मोड़ और उभार साफ झलक रहा था।









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