दोपहर की धूप में बाजार की धूल उड़ रही थी। सड़क किनारे रामलाल की दुकान पर मक्खियों का भिनभिनाना और लकड़ी के उस मोटे गंदे कुंद पर पड़े खून के सूखे धब्बे उस जगह की पहचान साफ बता रहे थे। रामलाल उम्र के उस पड़ाव पर था जहाँ चेहरे की झुर्रियाँ और जिस्म की ढलती ताकत उसके सालों पुराने पेशे की गवाही देती थी। वह रोज़ सुबह से बकरा, मुर्गा और सुअर काटने का काम करता था, जिससे पूरे इलाके में उसे 'रामलाल दादू' कहकर बुलाया जाता था। उसकी दुकान के सामने से गुजरने वाले लोग या तो मुँह फेर लेते थे या फिर दूर से ही उसे आवाज़ लगा देते थे।
उसी रास्ते से अठारह साल की Renuka गुज़र रही थी। रंगत साँवली और शरीर पर एक साधारण सा सूती कुर्ता पहने, वह अपने किसी घरेलू काम से बाजार आई हुई थी। जब उसने रामलाल को दुकान पर अपनी कुल्हाड़ी की धार तेज करते देखा, तो उसने कदम रोक दिए। मोहल्ले के बाकी लोगों की तरह वह भी रामलाल को बचपन से जानती थी, इसलिए उसने बिना किसी झिझक के सीधे दुकान की तरफ कदम बढ़ा दिए।









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