
रात के करीब दो बज रहे थे। एक्सप्रेस ट्रेन मूसलाधार बारिश को चीरती हुई अपनी रफ्तार से दौड़ी जा रही थी। फर्स्ट क्लास कूपे के शीशे पर पानी की बूंदें लगातार टकरा रही थीं, जिससे बाहर का नज़ारा पूरी तरह धुंधला हो चुका था। केबिन के भीतर सिर्फ एक मद्धम नीली नाइट लैंप जल रही थी, जो माहौल को और अधिक शांत और एकांत बना रही थी।
कूपे की एक तरफ की सीट पर ५८ वर्षीय रसूखदार और गंभीर बुजुर्ग व्यापारी बैठे थे। सफेद बालों और सलीके से कटी दाढ़ी वाले उन बुजुर्ग के चेहरे पर उम्र का एक सख्त अनुशासन और रईसी साफ झलक रही थी। वे शॉल ओढ़े, आँखें बंद किए ऐसे लेटे थे मानो गहरी नींद में हों। ठीक उनके सामने वाली सीट पर २४ वर्षीय शालीन और खूबसूरत युवा माँ अपने ६ महीने के बच्चे को गोद में लिए बैठी थी।








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