गर्मियों की वह दोपहर बेहद शांत और बोझिल थी। पूरी हवेली में सन्नाटा पसरा हुआ था, क्योंकि परिवार के सभी लोग खेतों पर गए थे। ७५ वर्षीय बड़े दादाजी, जो गाँव के पूर्व जमींदार थे, अपने भारी और एकांत वाले कमरे में बैठे थे। हवेली की पुरानी दीवारों और ऊँची छतों के बीच एक अजीब सा भारीपन था। दादाजी ने पुश्तैनी तिजोरी की चाबी देने के बहाने अपनी नई बहू को अपने कमरे में बुलाया।
बहू बहुत ही शालीनता और अदब के साथ कमरे के भीतर दाखिल हुई। उसने अपने सिर पर पल्लू ठीक किया और दादाजी के सामने आकर खड़ी हो गई।








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