मूसलाधार बारिश की वजह से पूरे इलाके की बिजली गुल हो चुकी थी। कोतवाली थाना इस वक्त केवल एक पुरानी लालटेन और मुंशी की मेज पर जल रही मोमबत्ती की मद्धम रोशनी में डूबा हुआ था। चारों तरफ सीलन की गंध और हवा में अजीब सी सिहरन थी। हवालात की सलाखों के पीछे से रह-रहकर कैदियों के घुर्राने की आवाजें आ रही थीं। जिया थाने के एक कोने में बने बेंच पर बैठी थी, उसकी सिल्क की हरी साड़ी बारिश के पानी से हल्की भीगी हुई थी, जिससे उसका गोरा बदन और उसकी कयामत ढाती बनावट साफ झलक रही थी।
जिया के ससुर, रघुवीर सिंह (उम्र 52 वर्ष), जो इलाके के एक रसूखदार और रॉक-सॉलिड बदन के जमींदार थे, मुंशी की कुर्सी के पास खड़े थे। उनका कड़क स्वभाव और रोबीली मूंछें थाने के माहौल में भी अपनी धमक बनाए हुए थीं। जिया के पति किसी कानूनी पचड़े में फंस गए थे, और उसी सिलसिले में रघुवीर अपनी इस बेहद खूबसूरत और चंचल बहू को लेकर आधी रात को पैरवी करने थाने पहुंचे थे।








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