घने जंगलों के बीच से गुजरने वाला वह संकरा रास्ता इस वक्त पूरी तरह वीरान हो चुका था। रात के करीब बारह बज रहे थे और आसमान में काले बादलों ने ऐसा डेरा डाला था कि हाथ को हाथ भी सुझाई नहीं दे रहा था। बिजली की हर कड़कड़ाहट के साथ चारों तरफ की खामोशी कांप उठती थी। काव्या अपनी साड़ी के पल्लू को उंगलियों में लपेटे हुए कार की फ्रंट सीट पर बैठी थी। उसके बगल में ड्राइविंग सीट पर उसके ससुर रमेश जी मुस्तैदी से स्टियरिंग थामे हुए थे। शहर से एक पारिवारिक समारोह निपटाकर लौटते वक्त वे इस बात से बिल्कुल अनजान थे कि प्रकृति ने उनके लिए कुछ और ही सोच रखा है।
अचानक, कार के बोनट से एक अजीब सी चरचराहट की आवाज आई और इंजन ने दम तोड़ दिया। हेडलाइट की रोशनी भी टिमटिमाकर बुझ गई और पूरी गाड़ी काले घने अंधेरे के आगोश में समा गई। ठीक उसी पल, आसमान जैसे फट पड़ा और मूसलाधार बारिश कार की छत पर भारी पत्थरों की तरह बरसने लगी।








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