
उस ठंडे और भारी माहौल में पूजा का दिल ज़ोरों से धड़क रहा था। नीचे बज रहे गानों का शोर अब इस बंद कमरे की खामोशी के सामने पूरी तरह धुंधला हो चुका था। दादाजी की आँखों में जो वात्सल्य हमेशा दिखता था, वह अब एक आदिम और तीखी वासना में बदल चुका था। उन्होंने डायरी को एक तरफ सरकाया और उनका भारी, खुरदरा हाथ पूजा के कुर्ते के ऊपर से उसकी पीठ को सहलाते हुए नीचे की तरफ बढ़ने लगा। पूजा पूरी तरह स्तब्ध थी, उसका शरीर डर और एक अनजानी घबराहट से जम गया था।
"दादाजी... आप यह क्या..." पूजा ने लड़खड़ाती आवाज़ में उठने की कोशिश की, लेकिन दादाजी के मजबूत हाथों ने उसकी कलाई पकड़कर उसे वापस बेड पर खींच लिया। उनके चेहरे पर अब कोई झिझक नहीं थी। दिसंबर की उस कड़ाके की ठंड में भी कमरे के भीतर की हवा अचानक गर्म और बोझिल हो गई थी। उन्होंने आगे बढ़कर पूजा को पीछे की तरफ धकेला और उसके ऊपर हावी हो गए।








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