
यह जून के महीने की एक बेहद उमस भरी और गर्म रात थी। हवा का एक झोंका भी नहीं चल रहा था, ऐसा लग रहा था मानो वक्त ठहर सा गया हो। गर्मी से परेशान होकर घर के सभी लोग—मम्मी, पापा और भाई-बहन—सोने के लिए छत पर चले गए थे। छत पर थोड़ी बहुत खुली हवा की उम्मीद थी, इसलिए सबने वहीं अपना बिस्तर लगा लिया था।
पूरे घर में सन्नाटा पसरा हुआ था। नीचे के कमरों में केवल पंखे की चरमराहट गूँज रही थी, जो ठंडी हवा देने के बजाय सिर्फ गर्म हवा फेंक रहा था। गर्मी इस कदर बर्दाश्त से बाहर थी कि मुझे बिल्कुल नींद नहीं आ रही थी। मेरा पूरा शरीर पसीने से भीग चुका था और बेचैनी बढ़ती ही जा रही थी।






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