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राजेश्वरी जी की तीखी और व्यंग्यात्मक मुस्कान दोनों भाइयों को और भी ज़्यादा चिढ़ा रही थी। विक्रम और समीर दोनों सोफे पर इस तरह मुँह फुलाकर बैठे थे मानो किसी ने बच्चों से उनका सबसे पसंदीदा खिलौना छीन लिया हो। समीर अपनी पीठ के दर्द से बिलबिलाते हुए बार-बार अपने बिखरे बालों में उँगलियाँ फेर रहा था, और विक्रम अपने कंधे के टांकों को अनदेखा करते हुए सीढ़ियों की तरफ टकटकी लगाए घूर रहा था।








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