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सीढ़ियों के नीचे से आती उस पीली रोशनी ने माया के कदमों को वहीं कील की तरह ज़मीन में गाड़ दिया। उसका पूरा शरीर कांप रहा था। फटा हुआ ओवरकोट उसके नंगे और वीर्य, पसीने व खून से सने जिस्म को बमुश्किल ढक पा रहा था। पीछे बेडरूम से अनन्या की पागलों जैसी चीखें और विक्रम-समीर की कराहें अभी भी गूंज रही थीं। लेकिन सामने तहखाने से आती वह रहस्यमयी आवाज़ किसी सम्मोहन की तरह उसे अपनी ओर खींच रही थी।








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