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कमरे की खिड़की से टकराती बारिश की बौछारें और कड़कती बिजली की रोशनी में माहौल और भी गर्मा गया था। विक्रम माया के ऊपर झुका हुआ था, उसकी भारी सांसें माया के गालों और गर्दन को झुलसा रही थीं। माया के दिल में विक्रम और समीर दोनों के लिए नफरत का लावा उबल रहा था, लेकिन विक्रम की आक्रामक पकड़ और उसके शरीर की बेकाबू गरमाहट माया को बेबस कर रही थी। माया ने अपनी दोनों कलाइयों को विक्रम की पकड़ से छुड़ाने की नाकाम कोशिश की, लेकिन विक्रम की पकड़ लोहे की तरह मजबूत थी।








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