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गाड़ी के भीतर पसीने की गंध और भारी सांसों के बीच हर्षित अपने चरम (climax) पर पहुँचने ही वाला था। वह युवंशी को पूरी ताकत से जकड़े हुए था, और उसके मुँह से एक लंबी आह निकली— "आह्ह्ह्ह्ह... युवंशी... तुम... उफ्फ्फ!"
जैसे ही हर्षित का sparm उसके शरीर को तृप्त करने ही वाला था, अचानक युवंशी ने अपना चेहरा घुमाया और सीधे हर्षित की आँखों में देखते हुए ठंडे और कड़वे स्वर में कहा, "आई हेट यू (I hate you), हर्षित!"
ये शब्द हर्षित के कानों में पिघले हुए सीसे की तरह गिरे। उसका पूरा शरीर एक पल के लिए जम गया। वह जुनून जो उसे पागल कर रहा था, अचानक बर्फीले गुस्से में बदल गया। उसने युवंशी के कंधों को झकझोरा और दहाड़ते हुए पूछा, "क्या कहा तुमने? क्या मतलब है तुम्हारा? क्या सच में उस अद्विक मल्होत्रा से प्यार हो गया है तुम्हें?"
युवंशी ने अपनी आँखों में भरे आंसुओं को पोंछा और अपने शरीर पर बने नीले और लाल निशानों की ओर इशारा किया, जो हर्षित की बेदर्दी की गवाही दे रहे थे।
युवंशी: (कांपती आवाज़ में) "ये देखिए... जो बर्ताव आज आपने मेरे साथ किया है ना, उसने मेरी आँखें खोल दी हैं। आप सिर्फ खुद से और अपनी हवस से प्यार कर सकते हैं। जो इंसान अपनी साख बचाने के लिए अपनी सगी बेटी की शादी किसी से भी करने को तैयार हो जाए, वो कुछ भी कर सकता है। आप प्यार के लायक ही नहीं हैं!"
यह कहकर युवंशी ने अपनी नज़्रें फेर लीं और चुपचाप खिड़की की ओर देखने लगी, जैसे हर्षित का वजूद उसके लिए खत्म हो गया हो।
हर्षित उसे देख रहा था, उसकी मुट्ठियाँ भिंच गई थीं। उसका ध्यान जब युवंशी के जिस्म पर गया, तो वह सन्न रह गया। गाड़ी की मद्धम रोशनी में युवंशी के सीने, पेट और जांघों पर दाँतों और उंगलियों के गहरे, दर्दनाक निशान बने हुए थे। वह अभी भी उसके अंदर पूरी तरह एंटर (entered) था, लेकिन अब वह गर्मी नफरत में बदल चुकी थी।
हर्षित ने अपनी आँखें गुस्से और आत्मग्लानि (guilt) के मारे कसकर बंद कर लीं। युवंशी के शब्दों ने उसे उसकी असलियत का ऐसा आईना दिखाया था कि उसका सारा अहंकार चूर-चूर हो गया।
हर्षित के भीतर जो आत्मग्लानि (guilt) एक पल के लिए जागी थी, युवंशी के "I hate you" और "मतलबी इंसान" वाले शब्दों ने उसे फिर से एक हिंसक क्रोध में बदल दिया। उसकी आँखों में पछतावे की जगह अब एक क्रूर अहंकार ने ले ली। उसने अपनी पकड़ युवंशी की कमर पर और भी मज़बूत कर ली, इतनी कि युवंशी के मुँह से सिसकी निकल गई।
हर्षित: (युवंशी के चेहरे को झटके से अपनी ओर घुमाते हुए, आवाज़ में ज़हर भरकर) "हाँ! हूँ मैं मतलबी! हूँ मैं सेल्फ-ऑब्सेस्ड (Self-obsessed)! और तुम्हें क्या लगा था? तुम्हारी नफरत मुझे रोक देगी?"
हर्षित ने एक ज़ोरदार अंतिम धक्का दिया और अपना सारा sparm युवंशी के भीतर गहराई तक छोड़ दिया। उसकी सांसें तेज़ थीं और चेहरे पर एक विजयी लेकिन भयानक मुस्कान थी। वह कुछ पलों तक उसी स्थिति में उसके ऊपर लदा रहा, जैसे अपनी जीत का जश्न मना रहा हो।
हर्षित: (हाँफते हुए, उसके कान के पास फुसफुसाते हुए) "अब क्या करोगी युवंशी? नफरत करती हो ना मुझसे? करो! जितनी चाहे उतनी नफरत करो। लेकिन याद रखना, अब तुम्हें इसी सेल्फ-ऑब्सेस्ड और मतलबी इंसान के साथ अपनी पूरी ज़िंदगी गुज़ारनी है। तुम चाहकर भी खुद को मुझसे अलग नहीं कर सकती।"
उसने धीरे-धीरे खुद को उससे अलग किया, लेकिन उसकी नज़रें अब भी युवंशी के उन निशानों पर थीं जो उसने अभी-अभी उसके जिस्म पर उकेरे थे। उसने अपना बेल्ट वापस बांधा और गाड़ी के स्टेयरिंग पर हाथ मारते हुए कहा:
हर्षित: "तुम मेरी पत्नी हो, मेरी जागीर हो। अद्विक मल्होत्रा तुम्हारी परछाईं को भी नहीं छू सकता। और रही बात मेरी बेटी की... तो मेरे फैसलों पर सवाल उठाने वाली तुम कोई नहीं होती!"
युवंशी बस शून्य में ताक रही थी, उसके शरीर का दर्द अब उसकी रूह के घावों के सामने छोटा लगने लगा था। हर्षित ने गाड़ी स्टार्ट की और टायर चिलाते हुए उसे सड़क पर वापस ले आया। गाड़ी की रफ़्तार अब फिर से बेकाबू थी, ठीक वैसी ही जैसी हर्षित की फितरत।
जैसे ही गाड़ी घर की दहलीज पर रुकी, घर के अंदर का सन्नाटा और भी गहरा महसूस होने लगा। हर्षित गाड़ी से उतरा, उसका चेहरा अब भी सख्त था, लेकिन उसकी आँखों में एक अजीब सी बेचैनी थी। युवंशी अपनी बिखरी हुई हालत को संभालने की कोशिश कर रही थी, उसके कपड़े अस्त-व्यस्त थे और उसके चेहरे पर हर्षित की बेरहमी के निशान साफ झलक रहे थे।
जैसे ही वे अंदर दाखिल हुए, सामने ही आर्य खड़ी थी। उसने जब अपनी सौतेली माँ युवंशी की यह हालत देखी—उसके फटे हुए कपड़े, गर्दन पर नीले निशान और उसकी सूजी हुई आँखें—तो उसका कलेजा मुंह को आ गया। उसने एक नज़र अपने पिता हर्षित पर डाली, जिनकी शर्ट की आस्तीनें मुड़ी हुई थीं और जो थके हुए लेकिन गुस्से में लग रहे थे।
आर्य का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुँच गया। वह समझ गई कि यह सब अद्विक की उस चाल का नतीजा है, जिसने उसके पिता के कान भर दिए थे। उसने बिना एक पल गंवाए अपना फोन निकाला और अद्विक का नंबर डायल किया।
आर्य: (फोन उठते ही, गुस्से में चीखते हुए) "क्या कर रहा है तू अद्विक? क्या यही तेरा प्लान था? तेरी उस घटिया चाल की वजह से आज मेरे डैड ने युवंशी के साथ इतना बुरा किया है जिसकी तू कल्पना भी नहीं कर सकता!"
अद्विक: (दूसरी तरफ से शांत और मयूस हंसी के साथ) "शांत हो जा आर्य... मैंने तो बस आग लगाई थी, उसे भड़काया तो तेरे डैड के शक ने है। अगर उन्हें अपनी पत्नी पर भरोसा होता, तो आज ये नौबत नहीं आती।"I
आर्य: "शट अप अद्विक! तूने एक औरत की गरिमा के साथ खिलवाड़ किया है। आज जो मेरे घर में हुआ है, उसके लिए मैं तुझे कभी माफ नहीं करुँगी। तूने डैड को एक जानवर बना दिया! तू चाहता क्या है? अगर युवंशी को कुछ हुआ, तो याद रखना मैं तुझे छोड़ूँगी नहीं!"
आर्य ने गुस्से में फोन काट दिया और दौड़कर युवंशी के पास गई, जिसने खुद को सोफे पर गिरा दिया था। हर्षित वहीं खड़ा अपनी बेटी का गुस्सा देख रहा था, लेकिन उसके पास कहने को कोई शब्द नहीं थे।
To be continue






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