
अगली सुबह की सुनहरी धूप जब खिड़की के पर्दों को चीरकर कमरे में आई, तो पूरा कमरा एक सुनहरी चमक से भर गया। आरती अभी भी गहरी नींद में थी, उसका अधनंगा बदन सफेद चादर के बीच किसी संगमरमर की मूरत जैसा चमक रहा था। दादू की नींद पहले ही खुल चुकी थी, लेकिन वह बिस्तर से उठे नहीं थे। वह बस कोहनी के बल टिके हुए अपनी पोती के उस बिखरे हुए हुस्न को निहार रहे थे, जिसे रात भर उन्होंने जी भर कर भोगा था।
धूप की गर्मी से आरती की पलकें धीरे से झपकीं और उसने एक लंबी अंगड़ाई ली। जैसे ही उसकी चेतना वापस आई, उसे अपने बदन के बीचों-बीच एक भारीपन और दादू की मौजूदगी का एहसास हुआ। उसने देखा कि दादू की नज़रें उसके उन उभरे हुए वक्षों पर जमी हुई हैं, जो रात की बेरहमी की वजह से अब भी हल्के लाल और सूजे हुए लग रहे थे।






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