
कमरे में आरती लेटी हुई थी, लेकिन बाहर हो रहे शोर-शराबे की वजह से उसकी आँखों से नींद कोसों दूर थी। घड़ी की टिक-टिक और बाहर से आती आवाजों ने उसके सुकून को जैसे छीन लिया था। वह बार-बार करवटें बदल रही थी, कभी तकिए को ठीक करती तो कभी चादर ओढ़ लेती, पर उसका मन कहीं शांत नहीं हो पा रहा था। थक कर उसने अपनी आँखें बंद कीं, मगर दिमाग में विचारों का बवंडर अब भी जारी था।
बिना किसी देरी के उसने अपने ऊपर से कंबल हटाकर एक तरफ फेंक दिया। कमरे की घुटन और मन की बेचैनी अब बर्दाश्त से बाहर हो रही थी। उसने अपनी सलवार का नाड़ा ढीला किया और उठकर बेड के किनारे बैठ गई। ठंडी हवा का एक झोंका खिड़की से अंदर आया, लेकिन उसके शरीर में अजीब सी तपन महसूस हो रही थी। अंधेरे कमरे में वह बस शून्य की ओर ताक रही थी, जैसे किसी फैसले पर पहुँचने की कोशिश कर रही हो।






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