गौशाला में गोबर की सड़ांध और मवेशियों की भारी साँसों के बीच काका ससुर और फूफा जी अपनी किस्मत को कोस रहे थे। रात का गहरा सन्नाटा था और बाहर मूसलाधार बारिश हो रही थी, जिसकी गूँज टीन की छत पर हथौड़ों की तरह बज रही थी। रंजीत के खौफ और मयूरी के हुक्म ने उन्हें घुटनों पर ला दिया था। अँधेरा इतना घना था कि उन्हें अपने हाथ तक दिखाई नहीं दे रहे थे, फिर भी वे कांपते हाथों से कीचड़ और गंदगी साफ़ करने की कोशिश कर रहे थे।
काका ससुर ने फुसफुसाते हुए फूफा जी का हाथ पकड़ा, उनकी आवाज़ में ज़हर घुला था, "देख रहे हो फूफा? उस कलमुँही मयूरी ने हमें कहीं का नहीं छोड़ा। रंजीत तो उसके पल्लू से बँधा कुत्ता बन गया है। हमें कुछ करना होगा... वरना ये हमें मार डालेंगे।"






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