
मयूरी का पूरा शरीर ससुर जी की दरिंदगी के बाद सुन्न पड़ चुका था, लेकिन जैसे ही उसने रसोई के दरवाज़े की दरार से काका ससुर और बहनोई की भूखी निगाहें अपने नग्न बदन पर पड़ती देखीं, उसके भीतर छिपी आखिरी हिम्मत जाग उठी। वह जानती थी कि अगर वह एक पल भी और वहाँ रुकी, तो ये दोनों भेड़िए उसे ज़िंदा नोच खाएंगे।
मयूरी ने लड़खड़ाते हुए अपने भारी शरीर को स्लैब से उठाया। उसकी साड़ी अभी भी छाती तक लिपटी थी और नीचे का बदन पूरी तरह बेपर्दा था। वह किसी तरह दीवारों का सहारा लेकर, अपने कांपते हाथों से बिखरे हुए कपड़ों को सँभालती हुई बाथरूम की ओर भागी। पीछे से उसे काका ससुर की दबी हुई हंसी और बहनोई के जूतों की आहट सुनाई दे रही थी, जो अब रसोई की दहलीज लांघ चुके थे।


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