उस अंधेरे स्टोर रूम में सन्नाटा इतना गहरा था कि हमारे दिलों की धड़कनें साफ सुनाई दे रही थीं। ससुर जी ने घबराहट में मेरे कान के पास झुककर फुसफुसाया, "सुगन्या, सुना तुमने? बाहर कोई है। हिलना मत और बिल्कुल चुप रहना।"
उनकी आवाज़ में डर और अधिकार का एक अजीब मिश्रण था। मैंने भी धीमी आवाज़ में सहमति जताई, "हाँ पापा, हमें इस हालत में कोई नहीं देख सकता। अनर्थ हो जाएगा।"






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