
ट्रेन के उस बंद केबिन का खेल तो खत्म हो गया, लेकिन हवस का सफर अब एक ऊबड़-खाबड़ रास्ते पर चल पड़ी पुरानी बस में शुरू होने वाला था। रात का आखिरी पहर था और बस पहाड़ी रास्तों से गुज़र रही थी।
आरज़ू, जिसकी उम्र 19 साल थी, अपनी जवानी के उस पड़ाव पर थी जहाँ उसका बदन किसी पके हुए फल की तरह रसीला हो चुका था। उसके साथ उसके पिता रघु बैठे थे, जिनकी उम्र 60 साल थी। रघु की कद-काठी आज भी किसी जवान को मात दे सकती थी, और अपनी ही जवान बेटी को देखते हुए उनकी आँखों में पिता के प्यार से कहीं ज़्यादा एक मर्द की भूख छिपी थी।






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