
महेश ठाकुर के आलीशान बंगले में सन्नाटा पसरा हुआ था, लेकिन उसकी आँखों में एक अजीब सी दहकती हुई आग थी। उसकी दूसरी पत्नी की एक्सीडेंट में मौत हुए अभी जुम्मा-जुम्मा चार दिन भी नहीं हुए थे, पर महेश की नज़रें अपनी सौतेली बेटी सोमैया पर टिकी थीं। सोमैया अभी महज़ उन्नीस साल की थी, जिसका बदन किसी ढलती हुई सुराही की तरह सुडौल और कसरती था। माँ की मौत के गम में डूबी सोमैया काली साड़ी में लिपटी खिड़की के पास खड़ी थी, जहाँ से ढलते सूरज की रोशनी उसके जिस्म के उतार-चढ़ाव को और भी नुमाया कर रही थी।
महेश दबे पाँव कमरे में दाखिल हुआ और दरवाज़े की कुंडी धीरे से चढ़ा दी। सोमैया ने पीछे मुड़कर देखा, उसकी आँखों में आंसू थे। "डैडी, आप यहाँ?" उसने मासूमियत से पूछा। महेश ने बिना कुछ बोले उसके करीब जाकर उसके कंधे पर हाथ रखा। उसका हाथ धीरे से फिसलकर सोमैया की नंगी कमर को छूने लगा, जो साड़ी के पल्लू से बाहर झांक रही थी। सोमैया का बदन उस अनचाहे स्पर्श से सिहर उठा।






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