
शादी का घर था, चारों तरफ फूलों की खुशबू और शहनाइयों की गूँज थी। काव्या अपने कमरे में सजी-धजी बैठी थी, लेकिन उसका मन अपनी सबसे पक्की सहेली मोहिनी में अटका था। मोहिनी का अभी तक कोई अता-पता नहीं था, जबकि शादी की रस्में शुरू होने वाली थीं।
दूसरी ओर, काव्या के सौतेले पिता श्यामलाल ऊपर से तो मेहमानों की खातिरदारी और इंतजामों में डूबे दिख रहे थे, लेकिन उनकी आँखों का 'ज्ञान' (निशाना) कहीं और ही था। उनकी नज़रें बार-बार अपनी पत्नी सुमित्रा पर जाकर टिक रही थीं।






Write a comment ...