
शादी का माहौल था और घर में चारों तरफ खुशियों की गहमागहमी थी। लखनऊ से काफी दूर एक रिश्तेदारी में शादी तय हुई थी, जिसके लिए पूरा परिवार उत्साहित था। केशव, जो मानसी के पिता थे, इस सफर की तैयारियों का जिम्मा संभाले हुए थे। मानसी की मां गायत्री अपने गहनों और कपड़ों को सहेजने में व्यस्त थी, जबकि मानसी का सौतेला भाई, जो अपनी शरारतों के लिए जाना जाता था, गाड़ी के पास चक्कर लगा रहा था।
किराए पर एक बड़ी गाड़ी बुक की गई थी और ड्राइवर समय पर दरवाजे पर हाजिर था। सफर लंबा था, इसलिए परिवार के बुजुर्गों—दादा और दादी—का जाना भी तय था। साथ ही फूफा जी ने भी अंतिम समय पर साथ चलने का मन बना लिया था। जब सब आंगन में इकट्ठा हुए, तो गिनती शुरू हुई। कुल मिलाकर 9 लोग थे—केशव, गायत्री, मानसी, उसका सौतेला भाई, दादा, दादी, फूफा जी, ड्राइवर और घर की एक और करीबी बुआ।






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