
मंजू शाम के धुंधलके में होली खेलकर घर लौटी तो उसका पूरा बदन रंगों से सराबोर था। गुलाल की परतों के नीचे उसकी त्वचा पसीने और पानी से चिपचिपी हो रही थी। घर बिल्कुल सुनसान था, क्योंकि परिवार के बाकी सदस्य शायद अभी भी गांव की टोली के साथ हुड़दंग मचाने में व्यस्त थे। मंजू को इस सन्नाटे में एक अजीब सी राहत महसूस हुई। उसके शरीर में रंगों की वजह से हल्की खुजली हो रही थी और उसे फौरन नहाने की तलब महसूस हुई।
उसने आंगन में रखे कुएं की ओर देखा। ढलते सूरज की आखिरी किरणें भी अब विदा ले चुकी थीं और धीरे-धीरे अंधेरा अपने पैर पसार रहा था। कुएं के पास लगे नीम के पेड़ की छाया ने वहां के माहौल को और भी गहरा और रहस्यमयी बना दिया था। मंजू ने सोचा कि बाथरूम के बंद घेरे से अच्छा है कि इस खुले अंधेरे में कुएं के ठंडे पानी से बदन साफ किया जाए। वहां कोई देखने वाला नहीं था, बस दूर कहीं सियार के रोने की आवाज और झींगुरों का शोर था।






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